लोभ का फल

लोभ का फल

एक व्यापारी था। वह बहुत लोभी था। उसकी कपड़े की कई दुकानें थीं। वह एक आलीशान मकान का मालिक भी था। जमीन खरीद रखी थी। फिर भी उस पर हमेशा धन बढ़ाने की धुन सवार रहती थी। बहुत सारी एक दिन वह बाजार से गुजर रहा था। वहाँ उसने एक आदमी के पास सोने के सिक्के देखे। ऐसे सिक्के उसने पहले कभी देखे थे। उसने उस आदमी के पास जाकर पूछा, ” क्यों भाई, ये क्या हैं?” उस आदमी ने कहा, ” ये अशर्फियाँ हैं हुजूर! इनकी कीमत हमेशा बढ़ती रहती है। जिसके पास अशर्फियाँ हों, उसे और कोई संपत्ति रखने की जरूरत नहीं पड़ती।” व्यापारी ने सोचा कि क्यों न ये अशर्फियाँ खरीद ली जाएँ। दुकानें, मकान, जमीन आदि की देखरेख करनी पड़ती है। उन्हें संभालना बहुत झंझट का काम होता है। अशर्फियों को संभालने में किसी तरह की परेशानी नहीं रहेगी। अतः उसने अपनी सभी दुकानें और जमीन आदि बेच डाली। उस धन से उसने अशर्फियाँ खरीद लीं। उन अशर्फियों को व्यापारी ने अपने घर के तहखाने में रख दिया। वह रोज रात को तहखाने में जाकर ये अशर्फियाँ गिनता यह उसका प्रतिदिन का कार्यक्रम बन गया था। एक रात अशर्फियाँ गिनकर वह चिल्ला उठा, “ हाय, इतने दिनों बाद भी मेरी अशर्फियाँ उतनी की उतनी ही हैं। एक भी अशर्फी बढ़ी नहीं है। ” उसकी यह आवाज बाहर खड़े एक चोर ने सुन ली। व्यापारी के सो जाने के बाद वह चोर उसके तहखाने में घुस गया और सारी अशर्फियाँ चुराकर ले गया। दूसरे दिन व्यापारी ने तहखाने में जाकर देखा तो उसकी सारी अशर्फियाँ गायब थीं। वह सिर पीटकर रह गया। सीख : अधिक पाने के लालच में आदमी अपना सब कुछ गँवा बैठता है।

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