लकड़हरा और देवदूत

लकड़हारा और देवदूत

गोपाल एक गरीब लकड़हारा था। वह रोज जंगल में जाकर लकड़ियाँ काटता था और शाम को उन्हें बाजार में बेच देता था लकड़ियों की इस बिक्री से मिले पैसों पर ही उसके परिवार का निर्वाह होता था। एक दिन गोपाल जंगल में दूर तक निकल गया। वहाँ उसकी दृष्टि नदी के किनारे एक बड़े पेड़ पर पड़ी। उसने सोचा कि आज उसे बहुत सारी लकड़ियाँ मिल जाएँगी। यह सोचते हुए वह अपनी कुल्हाड़ी के साथ उस पेड़ पर चढ़ गया। अभी उसने एक डाल काटना शुरू ही किया था कि अचानक उसके हाथ से कुल्हाड़ी छूट गई और नदी में जा गिरी गोपाल झटपट पेड़ से नीचे उतरा और नदी में कुल्हाड़ी ढूँढ़ने लगा। उसने बहुत कोशिश की पर कुल्हाड़ी उसके हाथ न लगी। वह उदास होकर पेड़ के नीचे बैठ गया। इतने में एक देवदूत वहाँ आ पहुँचा। उसने गोपाल से उसकी उदासी का कारण पूछा। गोपाल ने कुल्हाड़ी नदी में गिर जाने की बात उसे बताई देवदूत ने उसे धीरज बँधाते हुए कहा, “घबराओ मत, मैं तुम्हारी कुल्हाड़ी निकाल दूंगा।” यह कहते हुए देवदूत ने नदी में डुबकी लगाई। वह सोने की एक कुल्हाड़ी लेकर बाहर निकला। उसने गोपाल से पूछा, “क्या यही तुम्हारी कुल्हाड़ी है गोपाल ने कहा “नहीं महाराज, यह मेरी कुल्हाड़ी नहीं है। फिर दूसरी बार दुबको लगाकर देवदूत ने चाँदी की कुल्हाड़ी निकाली। तब भी लकड़हारे ने इनकार करते हुए कहा, नहीं, यह भी मेरी कुल्हाड़ी नहीं है। “देवदूत ने फिर डुबकी लगाई। इस बार उसने नदी से लोहे की कुल्हाड़ी निकाली। उस कुल्हाड़ी को देखते ही गोपाल खुशी से बोल उठा, “हाँ महाराज यही मेरी कुल्हाड़ी है। ” गोपाल की ईमानदारी पर देवदूत बहुत खुश हुआ। लोहे की कुल्हाड़ी के साथ सोने और चाँदी की कुल्हाड़ियाँ भी देवदूत ने गोपाल को इनाम में दे दीं गोपाल ने देवदूत का बहुत आभार माना। सीख ईमानदारी एक अच्छा गुण है ईमानदारी का फल मीठा होता है।

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