कौए की चतुराई

कौए की चतुराई

सरस्वती नदी के किनारे बरगद का एक पेड़ था। उस पर कौए का एक जोड़ा रहता था। पेड़ के पास बिल में एक विषैला साँप रहता था। कौआ कौवी जब आहार की तलाश में बाहर जाते, तब वह बिल कर उनके बच्चों को खा जाता था। इससे कौआ और कौवी दोनों बहुत दुखी थे। लेकिन उस साँप के सामने वे लाचार थे। में जा एक बार चंद्रपुर की राजकुमारी अपनी सखियों और सेवकों के साथ उस नदी पर स्नान करने आई। उसने अपनी अन्य चीजों के साथ अपना सोने का हार भी किनारे पर रख दिया। वह सखियों के साथ स्नान करने के लिए नदी में उत्तरी राजकुमारी के सोने के हार पर कौए की नजर पड़ी। उसे एक युक्ति सूझी। उसने तुरंत हार उठाकर सौंप के बिल के पास रख दिया। राजकुमारी स्नान करके नदी के बाहर आई। अपना स्वर्णहार न पाकर वह चीख पड़ी। उसने अपने सेवकों को बुलाया और हार ढूँढ लाने का आदेश दिया। सेवक हार ढूँढ़ने में लग गए। अचानक वह हार उन्हें साँप के बिल के पास पड़ा दिखाई दिया। सेवकों ने देखा कि हार के पास ही एक विषैला साँप कुंडली मार कर बैठा हुआ है। उन्होंने लाठियों से साँप को मार डाला और हार ले जा कर राजकुमारी कोसौंप दिया। राजकुमारी अपना हार पाकर खुश हो गई। कौआ-कौवी मन ही मन खुश हुए। इस प्रकार कौए ने बड़ी युक्ति से अपने दुश्मन साँप से छुटकारा पा लिया। सीख : जो काम ताकत से नहीं हो सकता, वह बुद्धि या चतुराई से हो सकता है।

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