एकता की शक्ति

एकता की शक्ति

एक गाँव में चतुर सिंह नामक एक धनी किसान रहता था। वह बूढ़ा हो गया था। उसके चार बेटे थे। वे आपस में लड़ते-झगड़ते रहते थे। बूढ़ा किसान उन्हें मिल-जुलकर रहने के लिए समझाता था पर पिता की सीख का उन पर कोई असर न होता था। एक बार चतुर सिंह बीमार पड़ा दिन-पर-दिन उसकी बीमारी बढ़ती गई। उसे विश्वास हो गया कि मृत्यु उसके बहुत निकट आ पहुँची है। उसे अपने बेटों के बारे में बहुत चिंता हो रही थी। आखिर उसने चारों बेटों को अपने पास बुलाया। फिर उसने लकड़ी का एक गट्ठर मँगवाया। उसने बारी-बारी से हर बेटे को वह गट्ठर तोड़ने के लिए कहा। हर बेटे ने गट्ठर तोड़ने को भरसक कोशिश की। पर उनमें से कोई भी उस गट्ठर को तोड़ नहीं सका। इसके बाद किसान ने वह गट्ठर खुलवा दिया। उसने उसमें से एक-एक लकड़ी हरएक बेटे को तोड़ने के लिए दी। सब ने अपनी अपनी लकड़ी आसानी से तोड़ डाली। तब किसान ने उनसे कहा, “अच्छा बताओ जब ये लकड़ियाँ गट्ठर के रूप में बँधी थीं, तब तुम इन्हें क्यों नहीं तोड़ पाए ?” बेटों ने कहा, “पिता जी पहले ये लकड़ियाँ गट्ठर में एकसाथ बँधी हुई थीं। इसलिए हम उन्हें तोड़ नहीं पाए। ” तब बूढ़े किसान ने उन्हें समझाया, “प्यारे बेटो गट्ठर की लकड़ियों की तरह तुम लोग भी संगठित रहोगे तो तुम्हारा कोई कुछ भी बिगाड़ नहीं सकेगा। किंतु तुम लोग आपस में लड़ते-झगड़ते रहोगे तो अलग-अलग लकड़ियों की तरह नष्ट हो जाओगे। ” बूढ़े पिता की यह सीख सुनकर चारों बेटों की आँखें खुल गई। उन्होंने मिल-जुलकर रहने का निश्चय किया। सीख एकता में बहुत शक्ति होती है।

Leave a Reply